Lord Ganesha

इसलिए भगवान गणेश जी को एकदंत नाम से किया जाता है सम्बोधित

किसी भी अच्छे काम को या कोई भी पूजा पाठ करने से पहले भगवान गणेश जी का नाम ज़रूर लिया जाता है। कहा जाता है के अगर कोई भी अच्छा काम करने से पहले भगवान गणेश जी का नाम लिया जाए तो सब काम अच्छे से होते है। तभी कोई भी अच्छा काम करने से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है। गणेश जी को और बहुत से नामों से सम्बोधित किया जाता है जैसे के गजानन, एकाक्षर, विघ्नहर्ता, एकदंत और आदि। लेकिन क्या आप जानते है के भगवन गणेश जी का एकदंत नाम से क्यों सम्बोधित किया जाता है। चलिए जानते है इसके पीछे की कहानी को :-

विद्या, बुद्धि, विनय, विवेक में भगवान गणेश अग्रिम हैं। वे वेदज्ञ हैं। महाभारत को उन्होंने लिपिबद्ध किया है। गणेश चतुर्थी को पट्टी पूजन विशेष रूप से किया जाता है। दुनिया के सभी लेखक सृजक शिल्पी नवाचारी एकदंत से प्रेरणा पाते हैं. एकदंत स्वरूप गजानन को भगवान परशुराम के प्रहार से मिला। एक बार शिवजी के परमभक्त परशुराम भोलेनाथ से मिलने आए। उस समय कैलाशपति ध्यानमग्न थे। गणेश ने परशुराम को मिलने से रोक दिया। परशुराम ने उन्हें कहा वे मिले बिना नहीं जाएंगे। 

गणेश भी विनम्रता से उन्हें टालते रहे. जब परशुरामजी का धैर्य टूट गया तो उन्होंने गजानन को युद्ध के लिए ललकारा। ऐसे में गणाध्यक्ष गणेश को उनसे युद्ध करना पड़ा। गणेश-परशुराम में भीषण युद्ध हुआ। परशुराम के हर प्रहार को गणेश निष्फल करते गए। अंततः क्रोध के वशीभूत परशुराम ने गणेश पर शिव से प्राप्त परशु से ही वार किया। गणेश ने पिता शिव से परशुराम को मिले परशु का आदर रखा। 

परशु के प्रहार से उनका एक दांत टूट गया। पीड़ा से एकदंत कराह उठे। पुत्र की पीड़ा सुन माता पार्वती आईं और गणेश को इस अवस्था में देख परशुराम पर क्रोधित होकर दुर्गा के स्वरूप में आ गईं। यह देख परशुराम समझ गए उनसे भयंकर भूल हुई है। परशुराम ने माता पार्वती से क्षमा याचना कर एकदंत की विनम्रता की सराहना की। परशुराम ने गणेश को अपना समस्त तेज, बल, कौशल और ज्ञान आशीष स्वरूप प्रदान किया।