Putrada Ekadashi 2020

Putrada Ekadashi 2020: जानिए कैसे करें पुत्रदा एकादशी पर व्रत-विधि का पालन, संतान की होगी प्राप्ति

हिन्दू धर्म में हर माह में एकादशी और पूर्णिमा आती है, जिस दिन सभी व्रत और पूजा कर  भगवान को प्रसन्न कर अपनी मनोकामना की पूर्ति की कामना करते हैं। इसी तरह हर साल सावन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है और संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। पुत्रदा एकादशी आज गुरुवार के दिन है। यह व्रत करने से संतान की प्राप्ति होती है। यह तिथि अत्यंत पवित्र तिथि मानी गई है। वर्षभर के प्रत्येक मास में 2 एकादशी तिथियां आती हैं। एक शुक्ल पक्ष और दूसरी कृष्ण पक्ष में। आज यानि पुत्रदा एकादशी पर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करना शुभ माना जाता है। 

पुत्रदा एकादशी की यह कथा- 
द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, वहा महीजित नाम का एक राजा था, लेकिन वह पुत्रहीन था इसलिए राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। उसका मानना था कि जिसकी संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा- हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है और मेने प्रजा को पुत्र के समान पाला है। मेने कभी किसी से घृणा नहीं की। सबको समान माना है। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मेरे पु‍त्र नहीं है, जो मैं अत्यंत दु:ख पा रहा हूं, इसका क्या कारण है? राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मं‍त्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए। वहां बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए। राजा की उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि को देखते-फिरते रहे।

एक आश्रम में उन्होंने एक बहुत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार, जितेंद्रीय, जितात्मा, जितक्रोध, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था। सबने ऋषि को प्रणाम किया। मुनि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूंगा। मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह मत करो।

ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले-  आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं। अत: आप हमारे इस संदेह को दूर कीजिए। महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है। फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी है। उन लोगों ने आगे कहा कि हम लोग उसकी प्रजा हैं। अत: उसके दु:ख से हम भी दु:खी हैं। आपके दर्शन से हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं। अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बतलाएं।

यह सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था। निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म किए। यह एक गांव से दूसरे गांव व्यापार करने जाता था। एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन वह जबकि दो दिन से भूखा-प्यासा था, एक जलाशय पर जल पीने गया। उसी स्थान पर एक तत्काल की ब्याही हुई प्यासी गौ जल पी रही थी। राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसीलिए राजा को यह दु:ख सहना पड़ा। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण उन्हें पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है। ऐसा सुनकर सब लोग कहने लगे कि हे ऋषि! शास्त्रों में पापों का प्रायश्चित भी लिखा है। अत: जिस प्रकार राजा का यह पाप नष्ट हो जाए, आप ऐसा उपाय बताइए। लोमश मुनि कहने लगे कि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं, तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो लोमश मुनि कहने लगे कि सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप जरूर ख़त्म हो जाएगा, साथ ही राजा को पुत्र की अवश्य प्राप्ति होगी। लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर मंत्रियों सहित सारी प्रजा नगर को वापस लौट आई और जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया।

इसके बाद द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया गया। उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और उसके एक बड़ा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। इसलिए हे राजन! इस सावन शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा पड़ा। अत: संतान सुख की इच्छा हासिल करने वाले इस व्रत को अवश्य करें।इस कथा को पढ़ने तथा इसके माहात्म्य को सुनने से मनुष्य इस लोक में संतान सुख भोगकर सब पापों से मुक्त हो जाता है और परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है।