Hieun Tsang

ह्वेन त्सांग की भारत यात्रा-वृत्तांत

ह्वेन त्सांग एक प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु हैं जो चीन और भारत दोनों में व्यापक रूप से जाने जाते हैं। लगभग 1300 साल पहले, 29 वर्षीय युवा भिक्षु ह्वेन त्सांग, चीन के थांग राजवंश की राजधानी छांगआन नगर से भारत गये थे। ह्वेन त्सांग ने प्राचीन भारत के भिन्न-भिन्न राज्यों का दौरा किया, नालंदा मंदिर में धर्म का अध्ययन किया, कई भव्य बौद्ध गतिविधियों में भाग लिया, और 15 साल बाद सैकड़ों बौद्ध धर्मग्रंथों के साथ थांग राजवंश की राजधानी वापिस लौटे।

बौद्ध धर्म ह्वेन त्सांग के द्वारा चीन में पेश नहीं किया गया था। माना जाता है कि ह्वेन त्सांग के कई सौ साल पहले ही बौद्ध धर्म का चीन में प्रवेश हो चुका था। थांग राजवंश की राजधानी में भी कई बौद्ध मंदिर थे जहां ह्वेन त्सांग रहा करते थे। हालाँकि, जब ह्वेन त्सांग बौद्ध धर्मग्रंथों का अध्ययन कर रहे थे, तो उन्होंने पाया कि पहले से अनुवादित बौद्ध धर्मग्रंथों में बहुत-सी त्रुटियां थीं और कई असंगत भ्रम भी थे। इसलिए, ह्वेन त्सांग ने अध्ययन करने के लिए बौद्ध धर्म के उद्गम स्थल पर जाने का फैसला किया। जाने से पहले ह्वेन त्सांग ने शपथ ली कि वह गंतव्य तक पहुंचने तक कभी पीछे नहीं हटेंगे।

लेकिन आज की तरह, उस समय थांग राजवंश में लोगों के प्रवेश और निकास पूरी तरह से मुक्त नहीं थे। ह्वेन त्सांग 629 ईस्वी (या 627 ईस्वी) में छांगआन से लियांगझोऊ (आज के कान्सू प्रांत के वूवेई नगर) पहुंचे। जहां तैनात शाही सैनिकों ने ह्वेन त्सांग को वापिस छांगआन लौटने का आदेश दिया। लेकिन ह्वेन त्सांग शाही आदेश का उल्लंघन कर सीमा चौकी से बचने में कामयाब रहे और पश्चिम में युमेनक्वान शिविर के करीब पहुंच गए। स्थानीय अधिकारियों ने अवैधानिक रूप से सीमा पार करने के कारण ह्वेन त्सांग के वांछित होने की आधिकारिक दस्तावेज भी भेजी। लेकिन स्थानीय लोगों की मदद से ह्वेन त्सांग ने थांग राजवंश की सीमा सफलतापूर्वक छोड़ दी।

प्राचीन काल में चीन और भारत के बीच भूमि परिवहन बहुत मुश्किल था। रास्ते में अंतहीन रेगिस्तान और अप्रत्याशित आंधियों के अलावा हर जगह डाकू और जंगली जानवर भी थे। विशाल रेगिस्तान के आकाश में केवल बवंडर और रेत भरा हुआ था। पर ह्वेन त्सांग के लिए रेगिस्तान में सबसे बड़ा खतरा था पीने के पानी का अभाव। कई बार कठिन परिस्थितियों के कारण ह्वेन त्सांग रेगिस्तान में बेहोश हुए। आज भी बहुत कम लोग हैं जो इतनी मुश्किल राह पर अकेले चल सकते हैं। प्राचीन काल में जहां तकनीकी साधनों की कमी थी, ह्वेन त्सांग अपनी महान यात्रा को पूरा करने में सक्षम थे, जिससे यह साबित है कि वह दृढ़ इच्छाशक्ति और असाधारण बुद्धिमत्ता वाले इंसान थे।

प्राचीन काल में चीन और भारत के बीच दर्जनों छोटे देश भी थे। उस समय इन देशों में भी बौद्ध धर्म व्यापक रूप से फैला हुआ था। कुछ देशों के राजाओं ने ह्वेन त्सांग की उत्पत्ति के बारे में पूछा और बांहें फैलाकर मदद दी। कुछ राजाओं ने उनकी रक्षा करने के लिए सेना भी भेजी, और मार्ग पर दूसरे देशों के राजाओं को पत्र लिखकर ह्वेन त्सांग की मदद करने को कहा। यह सब दर्शाता है कि मानव जाति का आम दिल है, वह बौद्ध धर्म और सत्य की खोज करने के लिए दूसरे लोगों, जो कभी नहीं मिलते हैं, को भी प्रभावित कर सकता है। दूसरों की मदद से ह्वेन त्सांग आखिरकार अपने गंतव्य भारत तक पहुंच गये।

ह्वेन त्सांग का भारत अनुभव
ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक, तीन साल की अत्यंत मुश्किल यात्रा और लगभग 25 हजार किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद ह्वेन त्सांग अंततः बौद्ध धर्म के पवित्र स्थल नालंदा मंदिर पहुंचे। ह्वेन त्सांग ने बौद्ध धर्म के इस सर्वोच्च मठ में सभी बौद्ध धर्मग्रंथों का अध्ययन किया। उनके कड़े अध्ययन और प्रगतियों की नालंदा मठ के सभी भिक्षुओं के द्वारा बहुत उच्च मूल्यांकन किया गया।    

बाद में ह्वेन त्सांग ने नालंदा मंदिर से विदा लेने के बाद पूरे भारत में पांच साल तक भ्रमण किया। अन्य जगहों में ह्वेन त्सांग ने प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षुओं से प्राप्त ज्ञान और कई पवित्र बौद्ध स्थलों का अवलोकन किया। तब तक ह्वेन त्सांग ने बहुत ही उच्च शैक्षणिक स्थान और उच्च सम्मान हासिल कर लिया था। जब वह नालंदा मंदिर वापस लौटे, तब वे इस सर्वोच्च बौद्ध संस्थान के प्रमुख वक्ता बने। बाद में ह्वेन त्सांग ने कुछ और साल बौद्ध धर्म के प्रचार और व्याख्यान में बिताए। उन्होंने विशेष रूप से अलग योग समुदायों में विरोधी विचारों के एकीकृत संलयन तथा महायान बौद्ध धर्म और हीनयान बौद्ध धर्म के विश्लेषण में उल्लेखनीय योगदान दिया।

गौरतलब है कि विभिन्न देशों के राजाओं तथा मंदिरों के भिक्षुओं के आमंत्रण के तहत, राजा हर्षवर्धन ने गंगा के पास स्थित कन्नौज नगर में ह्वेन त्सांग के सम्मान में एक भव्य समारोह का आयोजन किया। प्रतिभागियों में 18 देशों के राजा, पूरे भारत के 6,000 से अधिक प्रख्यात भिक्षु और विद्वान भी शामिल थे। यह उस समय भारत में एक अभूतपूर्व बौद्ध कार्यक्रम और सांस्कृतिक सम्मेलन माना जाता था। सभा में ह्वेन त्सांग मुख्य टिप्पणीकार के रूप में अपने व्याख्यान से सभी प्रतिभागियों को आश्वस्त दिया। सभा के बाद राजाओं ने उनकी भुरि-भुरि प्रशंसा की और उन्हें उपहार दिया। इसके बाद ह्वेन त्सांग एक हाथी गाड़ी में बैठे हुए एक शानदार परेड में भाग लिया जिससे उन्हें बौद्ध जगत में गौर्वांवित सम्मान मिला। 

भारत में 15 साल रहने के बाद ह्वेन त्सांग की खूबियाँ पूरी हुईं। उन्होंने पूर्वी क्षेत्रों के लोगों में बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए अपने मूल देश थांग राजवंश में लौटने का फैसला किया। ह्वेन त्सांग ने नालंदा मंदिर के भिक्षुओं से कहा कि बौद्ध धर्म का मूल अर्थ है लोगों को लाभ पहुंचाना। मैं बुद्ध के पवित्र अवशेषों को श्रद्धांजलि अर्पित कर चुका हूं और अब मैं थांग राजवंश लौटकर धर्मग्रंथों का अनुवाद करना और धर्म को बढ़ावा देना चाहता हूं। ह्वेन त्सांग के धर्म का प्रचार करने के लिए दृढ़ संकल्प और अपनी मातृभूमि के प्रति मार्मिक भावनाओं ने अपने गुरु और भिक्षुओं पर गहरी छाप छोड़ी। राजा और सहपाठियों से विदा लेने के बाद अंत में वे घर के रास्ते पर निकल पड़े। थांग राजवंश की राजधानी वापस लौटने के बाद ह्वेन त्सांग ने बौद्ध धर्मग्रंथों के अनुवाद में लगने के अलावा भारत में अपने पंद्रह वर्षों के अनुभव के आधार पर एक अमर कृति "थांग राजवंश का पश्चिमी क्षेत्र" भी लिखी।

( साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग )


Loading ...