हुक्मनामा

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 27 अगस्त

धनासरी महला ५ ॥ तुम दाते ठाकुर प्रतिपालक नाइक खसम हमारे ॥ निमख निमख तुम ही प्रतिपालहु हम बारिक तुमरे धारे ॥१॥ जिहवा एक कवन गुन कहीऐ ॥ बेसुमार बेअंत सुआमी तेरो अंतु न किन ही लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥ कोटि पराध हमारे खंडहु अनिक बिधी समझावहु ॥ हम अगिआन अलप मति थोरी तुम आपन बिरदु रखावहु ॥२॥ तुमरी सरणि तुमारी आसा तुम ही सजन सुहेले ॥ राखहु राखनहार दइआला नानक घर के गोले ॥३॥१२॥

हे प्रभु! तू सब दातें (बख्शीश) देने वाला है, तू मालिक हैं, तू सब को पालने वाला है, तू हमारा आगू हैं (जीवन-मार्गदर्शन करने वाला है) तू हमारा खसम है । हे प्रभु! तू ही एक एक पल हमारी पालना करता है, हम (तेरे) बच्चे तेरे सहारे (जीवित) हैं।१। हे अनगिनत गुणों के मालिक! हे बेअंत मालिक प्रभु! किसी भी तरफ से तेरे गुणों का अंत नहीं खोजा जा सका। (मनुष्य की) एक जिव्हा से तेरा कौन कौन सा गुण बयान किया जाये।१।रहाउ। हे प्रभु! तू हमारे करोड़ों अपराध नाश करता है, तू हमें अनेक प्रकार से (जीवन जुगत) समझाता है। हम जीव आत्मिक जीवन की सूझ से परे हैं, हमारी अक्ल थोड़ी है बेकार है। (फिर भी) तूं अपना मूढ़-कदीमा वाला स्वभाव कायम रखता है ॥२॥ हे नानक! (कह–) हे प्रभू! हम तेरे ही आसरे-सहारे से हैं, हमें तेरी ही (सहायता की) आस है, तू ही हमारा सज्जन है, तू ही हमें सुख देने वाला है। हे दयावान! हे सबकी रक्षा करने के समर्थ! हमारी रक्षा कर, हम तेरे घर के गुलाम हैं।