Hukamnama, हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी

हुक्मनामा श्री हरिमंदिर साहिब जी 11 अगस्त

बिहागड़ा महला ५ छंत घरु १ 
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हरि का एकु अच्मभउ देखिआ मेरे लाल जीउ जो करे सु धरम निआए राम ॥ हरि रंगु अखाड़ा पाइओनु मेरे लाल जीउ आवणु जाणु सबाए राम ॥ आवणु त जाणा तिनहि कीआ जिनि मेदनि सिरजीआ ॥ इकना मेलि सतिगुरु महलि बुलाए इकि भरमि भूले फिरदिआ ॥ अंतु तेरा तूंहै जाणहि तूं सभ महि रहिआ समाए ॥ सचु कहै नानकु सुणहु संतहु हरि वरतै धरम निआए ॥१॥

राग बेहागडा, घर १ में गुरु अर्जनदेव जी की बानी 'छंत'। अकाल पुरख एक है और सतगुरु की कृपा द्वारा मिलता है। हे मेरे प्यारे! मैंने परमात्मा का एक आश्चर्यजनक तमाशा देखा है की वह जो कुछ करता है धर्म अनुसार करता है, न्याय अनुसार करता है। हे मेरे प्यारे! (यह जगत) उस परमात्मा ने एक मंच बना दिया है, एक रंग-भूमि रच दी है जिस में जीवों के लिए जनम-मरण बी नियत कर दिया है। (जगत में जीवों का) जन्म-मरण उसी परमात्मा ने बनाया है जिस ने यह जगत पैदा किया है। कई जीवों को गुरु मिला कर अपनी हजूरी में टिका लेता है, और, कई जीव भटकन में आ के कुराहे पड़े रहते हैं। हे प्रभु! अपने (गुणों का) अंत तू आप ही जानता है, तूं सारी सृष्टि में व्यापक है हे संत जनों! सुनो, गुरु नानक जी एक अटल नियम बताते है (कि) परमात्मा धर्म अनुसार, न्याय अनुसार दुनिया का कार्य चला रहा है॥१॥